राष्ट्र ही हमारी पहचान है,सेवा ही हमारा धर्म है,संस्कार ही हमारी शक्ति
परमार्थ निकेतन में महापुराण का शुभारम्भ
रिपोर्ट श्रवण झा
ऋषिकेश-परमार्थ निकेतन में महापुराण कथा का शुभारम्भ स्वामी चिदानन्द सरस्वती महाराज के पावन सान्निध्य में हुआ।लंदन से आये यजमान परिवार,श्रीमती जयश्री राजा बेन व परिवार कथा व्यास मोहित शर्मा के श्रीमुख से पुराण का श्रवण कर रहे हैं।
परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष एवं स्वामी शुकदेवानन्द ट्रष्ट के मेनेजिंग ट्रस्टी स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि भारत की पुण्यभूमि ने ऐसे महापुरुषों को जन्म दिया है,जिन्होंने अपने जीवन,त्याग,तप और तपस्या से राष्ट्र के चरित्र का निर्माण किया।आज हम उन महान विभूतियों को श्रद्धा,कृतज्ञता और भावपूर्ण स्मरण के साथ नमन करते हैं,जिनके आदर्श आज भी हमारे राष्ट्रीय जीवन को दिशा और प्रेरणा प्रदान कर रहे हैं।‘हिंदवी स्वराज्य’की संकल्पना को साकार करने वाले छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती पर स्वामी जी ने कहा कि वे एक वीर योद्धा,दूरदर्शी राष्ट्रनायक,कुशल प्रशासक और लोककल्याणकारी शासक भी थे।उन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अदम्य साहस,नीति,धर्म और शौर्य के बल पर स्वाभिमान से परिपूर्ण राज्य की स्थापना की।उनकी शासन-व्यवस्था न्याय,सुशासन,धार्मिक सहिष्णुता और सांस्कृतिक गौरव पर आधारित थी। उनके लिए सत्ता साधन थी,साध्य नहीं,जनकल्याण ही उनका धर्म था।शिवाजी महाराज का जीवन हमें संदेश देता है कि राष्ट्रप्रेम त्याग और निर्भीक नेतृत्व से सिद्ध होता है।राष्ट्रबोध ,संस्कार और जीवन मूल्यों की चेतना के सशक्त केंद्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक‘राष्ट्रऋषि’माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर (गुरुजी) का जीवन अनुशासन ,संगठन और समर्पण का अप्रतिम उदाहरण है।उन्होंने भारत की सांस्कृतिक आत्मा को जगाने का कार्य किया।उनके विचारों में राष्ट्र सर्वाेपरि था और सेवा ही साधना।उन्होंने समाज को एकसूत्र में पिरोकर राष्ट्रीय एकता और चरित्र निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया।उनका जीवन हमें संदेश देता है कि सच्ची देशभक्ति मौन सेवा और निस्वार्थ कर्म में निहित है।महान स्वतंत्रता सेनानी,प्रखर राष्ट्रवादी विचारक और समाज सुधारक गोपाल कृष्ण गोखले ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को वैचारिक आधार और नैतिक दिशा प्रदान की।उन्होंने शिक्षा,सामाजिक सुधार और लोकतांत्रिक मूल्यों को राष्ट्रनिर्माण की आधारशिला माना।उनके चिंतन में संवाद,संयम और संवेदनशीलता का अद्भुत समन्वय था।महान स्वतंत्रता सेनानी,सुविख्यात शिक्षाविद एवं सामाजिक समरसता के प्रहरी आचार्य नरेन्द्र देव जी का स्मरण भी अत्यंत प्रेरक है।उन्होंने शिक्षा को समाज परिवर्तन का माध्यम बनाया और युवाओं में विचारशीलता,संवेदनशीलता तथा राष्ट्रसेवा की भावना जागृत की।उनका संपूर्ण जीवन कर्तव्य,आदर्श और सिद्धांतों के प्रति अटूट निष्ठा का प्रतीक था।स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि इन सभी महान आत्माओं का जीवन हमें एक ही संदेश देता है,राष्ट्र पहले,राष्ट्र प्रथम।स्वाभिमान,सेवा,सुशासन,समरसता और संस्कार ये केवल आदर्श नहीं,बल्कि भारत की आत्मा हैं।आज जब आधुनिकता की दौड़ में मूल्य कहीं धूमिल होते दिखते हैं,तब इन महापुरुषों की प्रेरणा हमें झकझोरती है और स्मरण कराती है कि हमारी शक्ति हमारी संस्कृति और चरित्र में निहित है।स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने परमार्थ गुरुकुल के ऋषिकुमारों तथा भारत सहित विश्व के अनेक देशों से पधारी विभूतियों को महापुरुषों के जीवन-चरित्र को जानने तथा उसे अपने आचरण में उतारकर जीने का संकल्प कराया।उन्होंने प्रेरित किया कि संतों और राष्ट्रनायकों के आदर्श तभी सार्थक होते हैं,जब वे हमारे विचार,व्यवहार और जीवन का हिस्सा बनें।इस अवसर पर प्रमोद ठक्कर,जसुबेन ठक्कर,सुधीर ठक्कर,भारती ठक्कर,शरद दत्ताणी,आराधना रोनक शोधन (अहमदाबाद से) और परिवार के अन्य सदस्यों मौजूद रहे।
0 टिप्पणियाँ