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बाहर का संसार शोर से भर जाए,तब भीतर की निस्तब्धता में लौट आना ही वास्तविक जीवन-स्वामी चिदानन्द सरस्वती’

बाहर का संसार शोर से भर जाए,तब भीतर की निस्तब्धता में लौट आना ही वास्तविक जीवन-स्वामी चिदानन्द सरस्वती

रिपोर्ट श्रवण कुमार झा

ऋषिकेश- परमार्थ निकेतन,आध्यात्मिकता,संस्कृतिक और आत्मिक ऊर्जा का अद्भुत संगम है। सुप्रसिद्ध अभिनेता अनिरुद्ध दवे परमार्थ निकेतन दर्शनार्थ आये।उन्होंने स्वामी चिदानन्द सरस्वती के पावन सान्निध्य में विश्व विख्यात गंगा जी की आरती में सहभाग किया।

भारतीय दूरदर्शन जगत में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित करने वाले अनिरुद्ध दवे ने अपने अभिनय से असंख्य दर्शकों के हृदय में स्थान बनाया है।उन्होंने राजकुमार आर्यन,वह रहने वाली महलों की,मेरा नाम करेगी रोशन तथा फुलवा जैसे लोकप्रिय धारावाहिकों में अपने सशक्त और संवेदनशील अभिनय के माध्यम से समाज के विविध आयामों को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया है।परमार्थ निकेतन में उनका स्वरूप एक कलाकार का नहीं,अपितु एक साधक का था,एक ऐसा साधक,जो जीवन के गहन सत्य की खोज में अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है। स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि भारतीय संस्कृति उस गहन परंपरा का अंश जो केवल ग्रंथों में नहीं,बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षण में विद्यमान है।तीर्थों पर आना तीर्थाटन करना एक आंतरिक यात्रा का माध्यम है।एक ऐसी यात्रा,जो हमें स्वयं से जोड़ती है और अपने वास्तविक स्वरूप का बोध कराती है।स्वामी जी ने कहा कि आज का समाज, विशेषकर युवा पीढ़ी,चाहे वह किसी भी क्षेत्र में क्यों न हो,अंततःअपनी आध्यात्मिक जड़ों की ओर लौटना चाहती है।आधुनिकता और प्रगति के इस युग में भी,भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता की प्रासंगिकता उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी सदियों पूर्व थी।मां गंगा के तट से प्रवाहित यह दिव्य प्रेरणा यह संदेश देती है कि जब जीवन में भ्रम,तनाव और अशांति बढ़े,तब समाधान बाहर नहीं,भीतर खोजने की आवश्यकता है।बाहरी संसार की उपलब्धियाँ क्षणिक हैं,परंतु आत्मिक शांति शाश्वत है।जब बाहर का संसार शोर से भर जाए,तब भीतर की निस्तब्धता में लौट आना ही वास्तविक जीवन है।गंगा जी की दिव्य आरती में सम्मिलित होकर अनिरुद्ध दवे ने उस दिव्य अलौकिक अनुभूति को आत्मसात करते हुये कहा कि यहां के आनंद कोे शब्दों में पूर्णतःव्यक्त करना संभव नहीं है।दीपों की ज्योति,मंत्रों की गूंज,गंगा की कलकल ध्वनि और पूज्य स्वामी जी का सान्निध्य हृदय को स्वतःही शांति और श्रद्धा से भर देता है।उन्होंने अपने भाव व्यक्त करते हुए कहा कि आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में हम अक्सर बाहरी उपलब्धियों के पीछे इतना अधिक दौड़ते हैं कि अपने भीतर के अस्तित्व को भूल जाते हैं परंतु परमार्थ निकेतन जैसे पावन स्थलों पर आकर यह अनुभूति होती है कि जीवन की वास्तविक सफलता बाहरी यश या प्रसिद्धि में नहीं,बल्कि आत्मिक संतुलन,शांति और संतोष में निहित है।

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