असत्य पर सत्य की जीत का पर्व विजय दशमी चूर होगा लंकेश का दंभ
महानगर में रावण,कुम्भकण और मेघनाथ के विशालकाय पुतलो का होगा दहन
दशहरा: मां दुर्गा की प्रतिमा का होता है पारंपरिक विसर्जन
सुख समृद्धि और विजय की कामना से जुड़ा है विजय दशमी का पर्व :महंत नीलकंठ शर्मा
रिपोर्ट-अमित मोनू यादव
सहारनपुर-सनातन संस्कृति में विजयादशमी का पर्व असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक माना जाता है.दशहरे का तात्पर्य 10 तरह की बुराईयों (काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ, अहंकार, आलस्य, मत्सर, चोरी और हिंसा) पर विजय पाना है. इस महापर्व का संबंध त्रेतायुग से है,जब भगवान राम ने बुराई ,असत्य और अहकार के प्रतीक लंकापति रावण का वध कर असत्य पर सत्य और बुराई पर अच्छाई की जीत प्राप्त की थी।
महानगर की सभी लीलाओं में रावण एल,कुंभकर्ण और मेघनाथ के पुतलो के दहन की सभी तैयारियों को पूर्ण कर लिया गया है।श्री राधा कृष्ण मंदिर क्लब का दशहरा कार्यक्रम गांधी पार्क मैदान में ,प्राचीन राम लीला का बेहट बस अड्डे पर, भारतीय कला मंच गोविंद नगर का गोविंद नगर ग्राउंड ,श्री कृष्ण नाटक क्लब,जुबली पार्क का राजकीय मैदान पर होगा।इसके अलावा उत्तर रेलवे नाटक क्लब,श्री आशुतोष समिति,मानवीय कल्याण समिति लेबर कॉलोनी,भारतीय कला संगम,रेलवे टीटू कॉलोनी आदि पर पुतले दहन का कार्यक्रम आयोजित होंगे।हिंदू मान्यता के अनुसार एक मान्यता यह भी है कि दशहरा के दिन ही देवी दुर्गा ने 10 दिनों तक चले युद्ध के बाद महिषासुर नामक राक्षस का वध करके लोगों को उसके अत्याचार से मुक्ति दिलाई थी.महंत नीलकंठ शर्मा ने दशहरा पर्व की महत्त्वता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि किसी भी कार्य को करने के लिए विजय दशमी का दिन बहुत ही ज्यादा शुभ माना गया है. इसी दिन अस्त्र-शस्त्र की विशेष रूप से पूजा भी की जाती है. हिंदू मान्यता के अनुसार यदि दशहरे के दिन किसी भी क्षेत्र में विजय की कामना को लेकर कार्य प्रारंभ किया जाए तो निश्चित रूप से उसमें सफलता मिलती है। उन्होंने बताया कि प्राचीन काल में भारतवंशी राजा-महाराजा विजय दशमी के दिन ही युद्ध के लिए प्रस्थान किया करते थे.वही आज के दिन ही देवी दुर्गा का विसर्जन भी पारंपरिक तरीके से किया जाता है. सुख-सौभाग्य और विजय की कामना से जुड़ा यह पावन पर्व देश के अलग-अलग हिस्से में अलग-अलग परंपरा एवं रीति-रिवाज के हिसाब से मनाया जाता है.
दशहरा पर विधि विधान से शस्त्र पूजन की है मान्यता;महंत सुमित भारद्वाज
महंत सुमित भारद्वाज ने बताते है कि विजयदशमी यानी दशहरा पर शस्त्र पूजन को लेकर कई मान्यताएं प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार, जब भगवान राम ने रावण का वध किया तो युद्ध पर जाने से पहले उन्हें शस्त्रों का पूजन किया था।महंत सुमित भारद्वाज एक अन्य मान्यता के विषय में बताते है कि जब मां दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था तो उनके शस्त्रों का पूजन सभी देवताओं ने मिलकर किया था। दशहरा पर शस्त्र पूजन की परंपरा सदियों से चली आ रही है। पहले राजा महाराजा भी युद्ध पर जाने से पहले अपने शस्त्रों की पूजा किया करते थे।


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