शिक्षा का उद्देश्य मानवीय सम्बन्ध केंद्रित सौहार्दपूर्ण और समावेशी सोच का विकास करना - प्रो.एच.डी.चारण
रिपोर्ट श्रवण कुमार झा
हरिद्वार- वर्तमान समय में सुविधा केंद्रित जीवन के साथ.साथ मानवीय दृष्टिकोण का संतुलन बनाए रखना अत्यंत जरूरी है।शिक्षा आचरण में सौहार्द सुनिश्चित करने की क्षमता रखती है।
उन्होंने कहा मनुष्य को संवेदनशील और समावेशी बना पाना मूल्य आधारित शिक्षा के द्वारा सम्भव है।गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के सभागार में आयोजित विशेषज्ञ व्याख्यान में एआईसीटीई के अंतर्गत राष्ट्रीय सार्वभौमिक मानवीय मूल्य समिति के अध्यक्ष प्रो.एच.डी.चारण ने कहा कि नई शिक्षा नीति.2020 के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए मूल्य.आधारित एवं समग्र शिक्षा अत्यंत आवश्यक है।एनईपी.2020की आकांक्षाओं को समग्र मूल्य.आधारित शिक्षा के माध्यम से पूरा करना विषय पर आयोजित इस व्याख्यान में प्रो.एच.डी.चारण ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान अर्जन तक सीमित नहीं होना चाहिए,बल्कि शिक्षा का उद्देश्य मानवीय सम्बंधो को लेकर समझ विकसित करना है ताकि मनुष्य समृद्धि और मानवीय सम्बंधो के मध्य समन्वय स्थापित कर सुख एवं संतुष्टि से जी सके। प्रो.चारण ने संबोधन में कहा कि मूल्य आधारित शिक्षा के प्रयोग से छात्रों के मध्य विवेकपूर्ण और समावेशी समझ के विकास को नई दिशा मिली है।मूल्य, समझ और प्रकृति के साथ सौहार्दपूर्ण रिश्ते ही प्रसन्नता का मार्ग प्रशस्त कर सकती है और यही जीवन का अंतिम लक्ष्य है।मानवीय सम्बंधो का प्रबंधन शिक्षा प्राथमिक उद्देश्य होना चाहिए ।प्रो.चारण ने कहा कि वर्तमान समय में सुविधा केंद्रित जीवन के साथ.साथ मानवीय दृष्टिकोण का संतुलन बनाए रखना अत्यंत जरूरी है।शिक्षा आचरण में सौहार्द सुनिश्चित करने की क्षमता रखती है।उन्होंने कहा मनुष्य को संवेदनशील और समावेशी बना पाना मूल्य आधारित शिक्षा के द्वारा सम्भव है।कुलपति प्रो.प्रतिभा मेहता लूथरा ने कहा कि आचरण की शुचिता वैदिक जीवन का आधार है।क्षुद्र मानवीय कामनाओं का अतिक्रमण करके हम जीवन के बड़े लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हैं।उन्होंने कहा कि वैदिक जीवन शैली हमें उत्कृष्ट मनुष्य बनने की प्रेरणा देता है ।कुलसचिव प्रो.सत्यदेव निगमालंकार ने कहा कि स्वामी श्रद्धानन्द ने महनीय लक्ष्यों के लिए गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय की स्थापना की थी।दासता की मानसिकता से मुक्ति दिलाने के लिए गुरुकुल की स्थापना की थी और विवि अपने स्थापना काल से ही वैदिक शिक्षा दर्शन को लागू करने का कार्य किया और आत्मनिर्भर भारत की नींव रखी।कार्यक्रम संचालन सांस्कृतिक अधिकारी डॉ.हिमांशु पंडित ने किया।वैदिक मंत्रोंचारण डॉ.दीनदयाल ने किया।विशेष व्याख्यान का समापन धन्यवाद ज्ञापन वित्ताधिकारी प्रो.वी.के.सिंह ने दिया।इस अवसर पर प्रो.प्रभात कुमार ,प्रो.देवेन्द्र कुमार गुप्ता,प्रो.एल.पी.पुरोहित, प्रो.राकेश जैन,प्रो.पंकज मदान,प्रो.डी.एस.मलिक,प्रो.विवेक गुप्ता,प्रो.मुकेश कुमार,प्रो.मयंक अग्रवाल,प्रो.विपुल शर्मा,प्रो.नवनीत,डॉ.सुहास,प्रो.सतेन्द्र राजपूत,प्रो.सुरेखा राणा,प्रो.नमिता जोशी,प्रो.सीमा शर्मा,मंजुषा कौशिक, प्रो.मुदिता अग्निहोत्री,डॉ.वरिन्द्र वाहला,डॉ.संगीता मदान,डॉ.बिन्दु मलिक,डॉ.अजय मलिक,डॉ.महेन्द्र कुमार असवाल,डॉ.उधम सिंह ,डॉ.अजीत सिंह तोमर,जनसम्पर्क अधिकारी डॉ.शिवकुमार चौहान,डॉ.दीनदयाल,उपकुलसचिव डॉ.श्वेतांक आर्य,डॉ.बबलू बेदालंकार,डॉ.भारत वेदालंकार,डॉ.अजेन्द्र कुमार,डॉ.राजकुमार भाटिया,डॉ.सुनील पंवार,डॉ.नितिन काम्बोज,डॉ.हरेन्द्र कुमार,डॉ.संदीप कुमार,डॉ.अनिल डंगवाल,चिरंजीव बनर्जी,वीरेन्द्र पटवाल,कुलदीप कुमार,कुलभूषण शर्मा,डॉ.यशपाल तोमर,प्रेमनिवास गुप्ता,डॉ.हिमांशु गुप्ता सहित विश्वविद्यालय के शिक्षक-शिक्षिकाएं एवं शोधार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
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